देहभाषा की रणनीति

June 23, 2008 at 6:32 am (विवक्षा)

इन दिनों टी.वी. पर देखने के लिये कोई भी चैनल लगाइये तो एक जैसा ही सब कुछ नज़र आता है/ सारे चैनल वालों, यहाँ तक कि बुद्धिजीविता की अलम्बरदार NDTV को यह विश्वास हो चुका है कि जनता कुछ और देखना नहीं चाहती सिर्फ़ साँप, नागिन रहस्य रोमांच और तान्त्रिक विद्याओं का सीधा प्रसारण देखना चाहती है/ सीधा यानि लाइव और लाइव से तो करेन्ट लगता है न/ इन्हीं लाइव शोज़ की जमात में एक और नाम जुड़ा है रियल्टी शोज़ का/ एक ऐसा ही रियल्टी शो प्रसारित हो रहा है आजकल MTV पर जिसका नाम है Splitsvilla/ इसमें 20 बालाएँ 2 लड़्कों को पटाने के लिये फ़्लर्ट कर रही हैं/ इसको कहा जा रहा है रोमान्स रियल्टी शो/ यह तो बाद की बात है कि इस रोमान्स में प्यार-व्यार टाइप की चीज़ कितनी होगी अभी तो सब का दिमाग जीतने पर मिलने वाले पैसे में लगा हुआ है/ सवाल यह है कि क्या लड़कियाँ सिर्फ़ एक प्रोडक्ट है जिनका काम सिर्फ़ लड़्कों को यानि कि अपने सम्भावित टारगेट क्लाइन्ट्स को आकर्षित करना है? क्या ऐसे कार्यक्रम और शो नारी की गरिमा के प्रतिकूल नहीं हैं? नारी या पुरुष की बात नहीं मानव की गरिमा के प्रतिकूल हैं/
हालाँकि यह साफ़ कर देना मौज़ूँ होगा कि अपन कोई धर्मध्वजी नहीं हैं ना ही भारतीय संस्कॄति के पतन की चिन्ता हमको सता रही है/
बिना नारीवाद का झण्डा बुलन्द किये और मोमबत्ती वाले प्रदर्शनकारियों की जमात में शामिल हुये भी यह सवाल मुझे सता रहा है/ यह सवाल सिर्फ़ एक कार्यक्रम से उपज पड़ा हो ऐसा तो नहीं है मगर सब प्रकार के कार्यक्रमों में, विज्ञापनों में और सबसे बड़ी बात विचारसंकुल में यह कन्सेप्ट या अवधारणा गहरे तक पैठते जा रही है/ आधुनिक आर्थिक क्रान्तिकारी परिवर्तनों के चलते यह विश्वास बन रहा है कि औरत ज़्यादा आजाद, सक्षम और स्वनिर्भर हो रही है जिसके चलते शायद दुनियाँ रहने के लिये एक बेहतर जगह होगी, मगर फ़िर वही जन्ज़ीरें किसी दूसरे नाम से डाली जा रही हैं और दुख की बात यह है कि इन पर सवाल भी नहीं उठाए जा रहे/
शायद ही कोई ऐसा विज्ञापन हो या कार्यक्रम हो जिसमे लड़कियों को यह धर्मादेश की भाँति बार बार न बताया जात हो कि तुमको गोरा होना है, खूबसूरत दिखना है और बाकी सब चीज़ें गईं भाड़ में ऐसे युवाओं से अगर किसी दिन हिन्दुस्ताने के प्रदेशों के नाम पूछ लो तो हवा सटक जाए/ सारी की सारी रणनीति सिर्फ़ देहभाषा तक सिमटती प्रतीत होती है/ चार्वाक के दर्शन क मतलब तो अब पता चल रहा है साब/ हालाँकि भौतिकता में कोई बुराई नहीं है/ ओशो बाबा की कुछ बातें जो मुझे ठीक लगती हैं उनमें एक यह भी है कि “हिन्दुस्तान वैसे ही आध्यात्मिकता के चक्कर में फ़ँस के बहुत कुछ गँवा चुका है, अरे उस लोक को सुधारने के पहले इस लोक को तो सुधारो/”
मगर अतिशयता तो इसकी भी बुरी ही है न/ दर-असल खूबसूरत दिखना कोई बुराई नहीं है मगर खूबसूरत दिखने का ख़ब्त हो जाना बीमारी है/ यह बीमारी हमारे यहाँ बेहिसाब तरीके फ़ैल रही है मानो कि हैज़ा हो/ बीमारी का मतलब आपके शरीर के सारे सन्साधन, स्रोत सब इसी की पूर्ति में लग जाते हैं उससे होने वाले क्षय और क्षरण को निवर्तन में/ इसी तरह इस खब्त में भी आपके सारे मानसिक शारीरिक स्रोत ऊर्जा आवेश सब सुन्दर दिखने में ही खर्च हो रहा है/ परेशानी का सबब यह है कि इन सबके चलते सामाजिक दायित्व, और समाज के साथ सन्निकटता क ज़बर्दस्त ह्रास हो रहा है/ और खुब्सूरत किसलिये दिखना ताकि लड़के आप पर आकर्षित हों और कुछ दिन फ़िदा रहें/
एक प्रायोजित प्रक्रम चल रहा है कि घुमा फ़िरा के यह बात समझा दी जाए कि बिना खूबसूरत दिखे तुम दुनियाँ में रहने लायक नहीं हो/ विशेषकर साँवला या काले रंग की लड़कियाँ या जिनके नैन नक्श अन्ग्रेज़ों सरीखे न हों/ यह बात समझने वाली है कि हिन्दुस्तान का आदमी सौन्दर्य के अगर ग्रीक मानदण्ड अपनाएगा तो काम चलने वाला नहीं है/ लैटिन सौन्दर्य में गोरे रंग नीली आँखों का महत्व हो सकता है मगर क्या ज़रूरी है कि ग्लोब के इस हिस्से में भी उन्हीं परिभाषाओं में सार्वत्रिक सत्य का संज्ञान कर लिया जाए? दर-असल सुन्दर दिखने में बुराई या अच्छाई वाली बात नहीं है/ सवाल यह है कि इन तमाम सारी चीज़ों के चलते जो हीन-भावना और ग्रन्थि तेज़ी से उत्तप्त की जा रही है बनिस्पत तथाकथित कम सुन्दर लड़कियों में, उसका हर्ज़ा कौन देगा? यह मूल कन्सेप्ट हो गया है हर एक विज्ञापन में, शो में, सीरियल्स में, जहाँ से हिन्दुस्तान गायब होता जा रहा है और इन्डिया छाता जा रहा है/ जिनमें कोई भी युवा लैटिनो से कम नज़र नही आना चाहता/
कुछ दिन से एक और आयाम जुड़ा है कि आज का बच्चा आज का भी उपभोक्ता है और कल का पक्का उपभोक्ता है/ कुछ दिन पहले एक एड देखा जिसमें छोटी सी बालिका को लम्बे घुँघराले बालों का महत्व समझाया जाता है और निष्कर्ष यह कि अमुक शैम्पू सबसे अच्छा है/ यदि बालमन में भी यह सब दिन रात बैठाते रहा जाएगा तो हमारे यहाँ नागरिक नहीं सिर्फ़ उपभोक्ता पैदा होंगे/
अपने साथ यह समस्या है कि बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ पहुँच जाती है/ बहरहाल ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगे ये तो कहने का दुस्साहस मै नही करूंगा मगर सोचने की बात यह है कि तथाकथित आज़ादी की हिमायती महिलाएँ ऐसे कार्यक्रमों पर चुप क्यों है जिनका उद्देश्य महिलाओं को सिर्फ़ एक उत्पाद और कमोडिटी के तौर पर पेश करना है/

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आया बम का मौसम आया

June 20, 2008 at 4:35 am (विवक्षा)

अभी सब लोग तैयारी कर लो…हिन्दू आत्मघाती बमों का मौसम आने वाला है/ महामहिम लोगों के दिमाग का एक और फ़ितूर/ राजनेताओं का काम ही शिगूफ़े उछालना है/ मुझ पर भी इस शिगूफ़े का भी असर इतना तो हुआ ही कि मेरा ब्लोग जो इतने दिन से बन्द पड़ा था आज इतनी व्यस्तताओं के बावजूद खुल गया/ बिना किसी वामपन्थी नुमा सेकुलर क्रेडेन्शियल्स के मोह पाश में फ़ंसे भी, यह बिल्कुल आसानी से बताया जा सकता है कि इस बयान का उद्देश्य क्या था? हालाँकि लोगों ने इस बयान की भर्त्सना की है और इस बालोचित विश्वास के चलते कि भर्त्सना के उपरान्त सब ठीक ठाक हो जाता है कानून का राज कायम हो जाता है महाराष्ट्र सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की/ वैसे वर्तमान महाराष्ट्र सरकार कार्यवाही करने के लिये नहीं बल्कि न करने के लिये ज़्यादा प्रसिद्ध रही है/ बहरहाल कुल जमा ये कि अब हिन्दू आत्मघाती दस्ते बनाये जाने हैं जिनका काम बांग्लादेशी घुसपैठियों की अवैध बस्तियों में फ़टना होगा/ बान्ग्लादेशी बस्तियों से याद आया एक मुख्यमन्त्री ठीक केन्द्र की नाक के नीचे बैठ के यह बयान दे चुकी हैं कि हिन्दुस्तान मे तो अतिथि सत्कार की परम्परा है और बांग्लादेशी इस नाते हमारे अतिथि हुए/ यह एक अलग चरम मूर्खता है/ हालांकि यह विश्वास कर पाना अत्यन्त दुष्कर प्रतीत होता है कि राजनीति के ऊंचे स्थानों को स्पर्श कर अरहे ये सत्ताधिष्ठान क्या वास्तव में इतने मूर्ख हैं? बचपन में मैं एक चुट्कुला सुनता था कि “मूर्ख बनने का ढोंग करते रहो ताकि दुनियां तुम्हें मूर्ख समझे मगर वास्तव में तो तुम मूर्ख हो नहीं इसलिये बेवकूफ़ कौन बना? दुनिया!” शायद इन्हीं रेखासूत्रों पर ये लोग चलते रह्ते हैं/ आश्चर्य नही कि ऐसे बयानों के समर्थक भी मिल जायें/ कबिरा इस सन्सार में भांति भांति के लोग…. बाकी यह बात समझने वाली होगी कि ये भांति भांति के लोग हमारी राजनीति में ही क्यूं भरे पड़े हैं/ बहरहाल एक सवाल पूछने की ज़ुर्रत करना चाहता हूं क्या बालासाह्ब अपने पुत्र-पौत्रों को इस धर्मयुद्ध में भेजेंगे या सिर्फ़ प्यादों को ही पिटवाया जायेगा? क्या उद्धव ठाकरे साब अपने शरीर पर बम बांध के “देशद्रोहियों” की मांद में घुसेंगे या “चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम” रहेगा?

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भाषा की विभीषिका

October 17, 2007 at 6:53 am (कुछ इधर की कुछ उधर की)

भाषा का इस्तेमाल किस तरह से अपने निजी और राजनैतिक उद्देस्यों की पूर्ति के लिये होता है यह कोई नयी या अपरिचित बात नहीं है/ सातवें दशक में त्रिभाषा फ़ार्मूला शिक्षा के क्षेत्र में लागू करने के समय भी ऐसा ही कुछ था/
ताजातरीन घटना झारखन्ड की है जहाँ एक नितान्त लँगड़ी अक्षम और व्यावहारिक तौर पर अस्तित्वविहीन सरकार ने उर्दू को द्वितीय भाषा घोषित कर दिया है/ ज्ञातव्य है कि इस प्रकार की माँग बंगाली, सन्थाली और अन्य बोलियों की तरफ़ से भी आ रही थी/ मगर इन सबको नज़र-अन्दाज़ करते हुए उर्दू को यह दर्ज़ा देने का फ़ैसला किया गया/
बतौर एक भाषा उर्दू से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती, मगर झारखण्ड में यह कितनी व्यावहारिक और अपरिहार्य है, यह विचारणीय बिन्दु है/ झारखण्ड एक जनजातीय बहुल राज्य है जिसमें कई लोकभाषाएं प्रचलित हैं, ये लोकभाषाएं जनजातीय समाज का इतिहास, वाचिक परम्परा और संस्कृति की अभिन्न सहचरियों की भूमिका निभाती चली आ रहीं हैं/ काफ़ी बड़ी संख्या में बंगाली प्रवासी भी इस राज्य में हैं जो बंगला को द्वितीय भाषा का स्तर देने का मज़बूत आधार और तर्क प्रस्तुत करते हैं/ इन सब तर्कों और भावनाओं को निरस्त करते हुए, राजनैतिक सौदेबाज़ी के तहत और चिरन्तन वोट बैंक पॉलिटिक्स के मँझे हुए खिलाड़ियों ने उर्दू को राजभाषा बना दिया/
विडम्बना यह है कि उर्दू भाषियों की संख्या राज्य में न केवल अल्प परिमाण में है बल्कि यह भाषा ऊपर से थोपे गये होने का भी आभास कराती है क्योंकि यह जनजातीय लोगों के जीवन पद्धति से जुड़ी हुई नहीं है/ विडम्बना यह भी है कि प्रदेश की मुख्यमन्त्री की गद्दी पर मधु कौड़ा विराजे हुए हैं, जो स्वयं जनजातीय वर्ग से सम्बद्ध हैं/ ज़्यादा तार्किक और बेहतर यह होता कि किसी लोकभाषा को यह दर्ज़ा दिया जाता जिससे आदिवासी और पारम्परिक समुदायों को मुख्य धारा में लाने की शासकीय वादों की भूतल स्तर पर परिणिति की दिशा में एक मजबूट कदम माना जाता/ (मुख्य धारा का मिथक भी विवादास्पद है क्योंकि मुख्य और गौण तय करने का अधिकार हमको किसने दिया?)
यह समझना बिल्कुल बुद्धि के परे है कि क्यों जनजातीय समुदायों की माँगों को नकारा जाता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों की माँगों को बिना किसी हो हल्ले के चुपचाप मान लिया जाता है/
एक अद्भुत सरकार ऐसा ही कर सकती है क्योंकि उसे किसी भी समय चुनाव की रणभेरी सुनाई दे सकती है/ और ऐसे में राज्य के धर्म निरपेक्ष नेता गण अल्प्संख्यकों के विकास के बजाय भाषा और त्योहारों की छुट्टी के नाम पर वोट माँगने जा सकते हैं/
भाषा के साथ ऐसा खेल वे ही लोग खेल सकते हैं जिन्हें दिन के ३ बजे भी राजनीति सूझती है और रात के ३ बजे भी/

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चन्द्रशेखर का अवसान- एक युग का समापन

July 11, 2007 at 5:30 pm (कुछ इधर की कुछ उधर की)

अध्यक्ष जी का देहावसान हिन्दुस्तान की राजनीति के छायादार बरगद के पेड़ का गिरना है/ एक ऐसा पेड़ जिस पर लोग आशा की दृष्टि से देखते थे/ राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी राय ली जाती थी और गुनी जाती थी/ तेजी से क्षरित होते जाते राजनीतिक मूल्यों के इस दौर में अध्यक्ष जी उन चन्द नेताओं में थे जिनके लिए लोगों के दिलों में सम्मान था, जिनकी तरफ़ आशा और अपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था/ युवा तुर्कों की तिकड़ी के नेता कांग्रेस के उस हरावल दस्ते में शामिल थे जिसने कांग्रेस के भीतर रहकर इमर्जेन्सी का विरोध किया/ भले ही इसके चलते उन्हें जेल भेज दिया गया/
चन्द्रशेखर की राजनीति के स्टाइल और तरीके को लेकर भले ही कई मत प्रतिमत रहे हों मगर उनका सुदीर्घ और बेदाग़ संसदीय जीवन अपने आप में सम्मान और श्लाघा का विषय है/
यह बात चन्द्रशेखर में ही थी कि सांसद गण दलीय सीमाओं से परे उनका सम्मान करते थे/ संसद की कार्यवाहियों के सजीव प्रसारणों में कई बार अध्यक्ष जी को संसद को दिशा देते हुए और घर के बुजुर्ग की भूमिका में देखा/ बुजुर्ग भी ऐसा जो वास्तव में मर्यादा और नीतियों का पक्षधर हो न कि सिर्फ़ लीक पीटने वाला लकीर का फ़कीर/
यही वजह थी कि अध्यक्ष जी जब भी संसद में बोलते थे तो सारी संसद उन्हें सुनती थी/ यह बात शायद अटल जी के साथ भी नहीं है क्यों कि उन्हें भाजपा का नेता माना जाता है जबकि चन्द्रशेखर अपनी पार्टी के अकेले सांसद होने के नाते निर्गुट किस्म के नेता हो गए थे/
मुझे याद पड़ता है टी.वी. पर सजीव प्रसारण के दौरान देखा था कि एक बार जब NDA सरकार के रक्षा मन्त्री जॉर्ज फ़र्नांडिस किसी मुद्दे पर आग उगल रहे थे और वामपन्थी दूसरे तरफ़ प्रतिरोध के स्वर में मुखर थे, तब संसद में अत्यन्त अप्रिय स्थिति पैदा हो गई थी/ तब चन्द्रशेखर ने बात सम्हाली थी/ ऐसे तमाम हालातों में चन्द्रशेखर उठते थे, संसद को समझाइश देते थे और बाकी संसद उनके द्वारा दी गई व्यवस्थाओं को मानती भी थी/ एक बार अध्यक्ष जी किसी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर बोल रहे थे इतने में कोई नए सांसद गणों ने कुछ कमेंट कर दिया/ अध्यक्ष जी ने तुरन्त कहा कि अब आप ही बोल लें मैं बैठा जाता हूँ/
जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते अध्यक्ष जी का सम्बोधन उनके साथ चस्पा हो गया/
मात्र ५० की उम्र में इतने बड़े गठबन्धन जैसे पार्टी का नेतृत्व चन्द्रशेखर के बस की ही बात थी/ एक पुस्तक पढ़ी है हिमाचल के पूर्व मुख्यमन्त्री शान्ताकुमार जी की/ उसमें वे कहते हैं चन्द्रशेखर पार्टी को टूट से बचाना चाहते थे मगर कोई उनकी सुनता ही नहीं था/ विशेषकर राजनारायण और मधु लिमये जैसे दिग्गज/
बहरहाल वह प्रयोग देश की राजनीति को एक अलग दिशा तो दे गया/ नए समीकरण बने और यह सिद्ध हुआ कि देश की सबसे बड़ी पार्टी को सत्ता से बेदखल भी किया जा सकता है/ उस दौर ने मुल्क को तमाम क्षेत्रीय क्षत्रप और राष्ट्रीय दिग्गज दिए/ उनमें से कई अब भी राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं/
चन्द्रशेखर की बड़ी बात उनका देशज मिजाज़ और भारतीयता से जुड़ाव था/ वैश्वीकरण के मुद्दे पर वे आखिर तक असहमत रहे और झंडा बुलन्द किये रहे/ यह सब सिद्धान्तों के राजनीति करने वालों के आखिरी दस्ते के संसदीय सेनानी थे/
विरोध यानि कि खुला विरोध गुपचुप विरोध अध्यक्ष जी की फ़ितरत नहीं थी/ राजा मांडा के प्रधानमन्त्री बनते वक़्त भी चन्द्रशेखर ने विरोध किया और सहमति का लबादा नहीं ओढ़ा/ वी.पी.सिंह अपनी आत्मकथा “मन्ज़िल से ज़्यादा सफ़र” में इस बात का उल्लेख करते हैं कि चन्द्रशेखर संसदीय दल की बैठक से उठ कर चले गए थे/
एक कमज़ोर सी सरकार का मुखिया बहुत कुछ कर नहीं सकता और चन्द्रशेखर के साथ भी ऐसा ही हुआ/ उनके खाते में वित्तीय कुप्रबन्धन की शिकायतें हैं और उन्हीं के समय में हिन्दुस्तान का सोना विदेश में गिरवी रखा गया/ मगर उन्हीं के समय में कहा जाता है कि अयोध्या विवाद सुलझने के कगार पर पहुँच गया था/ महन्त रामचन्द्रदास, संघ और अन्य पक्षों के साथ बैठकर एक सामान्य सर्वानुमत रास्ता निकालने का पथ प्रशस्त हो रहा था मगर तब तक सरकार का पतन हो गया/ बड़े लोगॊ के बड़े खेल! अगर विवाद के हल वाली बात सही मानी जाए तो कभी कभी सोचता हूँ कि क्या इन दोनॊ घटनाओं के बीच कोई सहसम्बन्ध है? ये सब घटनाएं इतिहास के गर्त में खो जाती हैं/
अपने अन्तिम दिनों में अध्यक्ष जी को देखना एक शेर को तिल तिल कर मौत के तरफ़ बढ़ते हुए देखना था बीमारी से वे अत्यन्त कमज़ोर हो गए थे, मगर वे लड़ते रहे/ आगरा में मेरे एक मित्र हैं उनके मित्र के पिता अध्यक्ष जी के मिलने वालों में से हैं, वे बताते हैं कि जिस आदमी की दहाड़ ताउम्र आप सुनने के अभ्यस्त रहे हों उसे धीमे धीमे बोलते सुनना कारूणिक रूप से दुखद है/ कीमियोथेरेपी से भी अध्यक्ष जी ज़्यादा दिन नहीं चल सके/ मौत आनी ही थी/ बहुत लोगों के लिये चन्द्रशेखर का निधन एक पूर्व प्रधानमन्त्री का देहावसान है, बहुतों के लिए एक राजनेता का/ मगर मेरे लिए चन्द्रशेखर राजनीतिज्ञों की उस विरल होटि हुई नस्ल के आदमी थे जो मुल्क का दिल जानती थी/
आज हिन्दुस्तान के दिल को जानने वाले और आत्मा को पहचानने वाले कितने नेता बचे हैं? जो लोग समझने पहचानने का दावा करते हैं वे सिर्फ़ चुनाव जीतने को अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं/
किसी भी मुल्क का इतिहास बहुत बड़ा होता और हिन्दुस्तान जैसे मुल्कों का इतिहास तो अत्यन्त विस्तृत और गहन होता है/ मगर फ़िर भी कुछ लोगों का जीवन इतिहास के पत्थर पर लकीर खींच जाता है/ चन्द्रशेखर ने यह लकीर सत्ता के माध्यम से नहीं खींची इसलिए यह और अधिक महत्वपूर्ण और सम्मानित है/ उनके जीवन के कुछ साल ट्रेजरी बेन्च पर बैठने वाले छोड़ दें तो ताउम्र विपक्ष में बैठने वाले चन्द्रशेखर मूल्यों और आदर्शों की प्रतिबद्ध राजनीति के नाविक थे/
म्रूत्यु के पहले वे श्रद्धेय थे अब स्मरणीय हो गए हैं/

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June 11, 2007 at 9:29 am (कुछ इधर की कुछ उधर की)

मौत दबे पाँव नहीं आती आजकल…गोलियाँ दाग़ते हुए आती है

लोग मर रहे हैं नन्दीग्राम हो या बस्तर का सुदूर बीजापुर/

भीड़ भड़क जाती है, पुलिस मज़बूर… भरभरा के दाग़ती है सतरें गोलियों की/

धाँय धाँय धू धू  धाँ….भीड़ मर रही है/

उन सबके राज्यों में, जो कहते हैं खुद को चाहे राष्ट्रवादी या मज़दूरों के अलम्बरदार

हज़ारों हज़ार लोग ढो चले हैं अपने मकान अपने सिरों पर, छोड़ रहे हैं ज़मीनें अधजुती

ताकि विकास हो सके देश का/ कुछ और खरब पति कर सकें नाम रोशन/

सारा मुल्क एक SEZ है?

आज चाँद सचमुच काला पड़ गया है. तारे दिखते हैं खूनी लाल

बस कुछ लोग मरे हैं शासकों के राज में

हुक्काम अलमस्त फ़्रेन्च वाइन के लुत्फ़ में गुम/

झण्डे उठा के जो पीछे चले थे, उन्हीं के ड्ण्डे बरस रहे हैं/

SEZ का नक्शा खिंचा सा जाता है लाल लाल लकीरों से/

धान के बोझे ढोने वाली पीठें हरहरा के गिर रही हैं एक के बाद एक/

नाम बदल जाते हैं/

सरकारें सिर्फ़ सरकार हैं कार्बन कॉपी एक दूसरे की/

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया..

कि विकास के डैने फ़ैल रहे गाँव गाँव गली गली/

भीतर तक चौके की सिगड़ी तक विकास/

आलू के चोखे में भी विकास नज़र आएगा…बस थोड़ा देर और..

शाम की खबर “मारे गए पुलिस के लोग नक्सलियों के हाथ झुण्ड के झूण्ड”

मार्क्स कितनी बन्दूकें छिपा गए तुम बस्तर के गिरिकाननों में?

यहाँ भी लोग मर रहे हैं/ नई भर्तियाँ नई मौत का नैवेद्य हैं/

कागज़ काले हो रहे हैं व्यर्थ ही इधर धरती लाल/

देख रहे हैं सब चुप चुपचाप गुमसुम/

जो नहीं ख्वाहिशमन्द देखने के बन्द कर लें आँख अपनी

खेल लम्बा चलेगा/

ज्ञानी विद्वज्जन कहते हैं पोथियाँ खोल खोल…आँकड़ों के मज़बूत सबूतों के साथ/

हिन्दुस्तान के जाहिल ही नहीं चाहते विकास

तुम्हारा ही भला होगा मूर्खो

क्यों नहीं चाहते मिनिरल वाटर पीना

क्यों नहीं चाहते इन्स्टेन्ट कुक्ड फ़ुड

गँवार ही रहोगे बनाओगे आलू की भुजिया हाथों से/

नहीं समझते तो मरो/

विकास की कीमत अता करो/

हम बेखबर इससे सुबह की सुर्खियों को चाय में डुबो के पी रहे हैं

टैक्स प्लानिंग के आकर्षक उपाय” के टोस्ट के साथ/

मुद्दा अल सुबह की बहस का कि शेयर हैं प्रोफ़िटेबल या म्यूचुअल फ़ंड/

चलो नन्दीग्राम के बहाने खुल सा गया राज़

हिन्द भर में हो रही मौतें/

महामारी की मानिन्द बन्दूक का शासन/

नहीं जानता कि कीमत क्या है विकास की,

और कौन तय कर रहा है क्रेता विक्रेता इस खेल के/

बस देखता हूँ तो ये कि मेरा घर,

एक भट्टी की तरह दहक रहा है इस आँच से/

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लो एक और कारनामा

June 6, 2007 at 6:46 pm (कुछ इधर की कुछ उधर की)

ताज़ा खबर ये है कि शिवसैना के बहादुरों ने जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं, मुम्बई की बार गर्ल्स को मारा पीटा/ उन्हें ५ दिन के भीतर घर छॊड़ के चले जाने को कहा गया है/ किस अधिकार के तहत! पता नहीं/ इनमें से कई बार गर्ल्स ऐसी हैं जिन्होंने पूँजी लगा के ये मकान खरीदे हैं/ अब उन्हें छोड़ने को कहा जा रहा है/

मैं नहीं जानता नैतिकता क्या है? समाज के नैतिकता के मानदंड क्या है? मगर एक सवाल ये है कि कब और कैसे शहर को स्वच्छ करने की महान ज़िम्मेदारी इन लोगों के काँधों पर आ गई/ मैं बार गर्ल्स के ऊपर कोई शोध कर चुका होऊँ ऐसा भी नहीं है/ पहले सरकार ने उन्हें मुम्बई को साफ़ बनाने की पहल करते हुए निकाला दिया अब ये भाई लोग/

एक सीधी बात तो ये लगती है कि कमज़ोर को सब दबा सकते हैं सो दबा रहे हैं/ बँगलादेशी घुसपैठियों को निकालने के लिये कोई तार्किक परिणिति वाला अभियान ये नहीं चला सकते/ अय्याश नशे की तिज़ारत का मरकज़ बनते जा रहे शहर को उस गिरफ़्त से आज़ाद कराने की ज़हमत नहीं उठाएंगे रेव पार्टीज़ में जाने वाले अय्याश लोगों के खिलाफ़ ये कुछ नहीं करेंगे/ ये समाज से भ्रष्टाचार हटाने के लिये जंग नहीं करेंगे/ ये मुम्बई को कचरा मुक्त कराने के लिये आगे नहीं आएंगे/ ये धारावी को बेहतर सुविधाएं नहीं देंगे/ ये कभी बिहारियों को पीटेंगे कभी बार गर्ल्स को भगा के शहर साफ़ करने की स्कीम चलाएंगे/

ये सिर्फ़ मवाद को नोचने का काम करेंगे इनके पास दृष्टि ही नहीं है बीमारी की तह तक जाने की/

आखिर मुम्बई में इतनी बड़ी संख्या में बार गर्ल्स क्यों है? क्या यह कोई पसन्दीदा व्यवसाय है? या एक विवशतापूर्ण अर्थोपार्जन? समझ नहीं सकता कि वैश्याओं या कहूँ कि आधुनिक बार गर्ल्स से सबसे ज़्यादा खतरा शरीफ़ लोगों को ही क्यों होता है?

शराफ़त की सारी ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही है/ उन्हें चाहिए कि वे पर्दे में रहें छुप के रहें ढक के रहें ताकि हम धर्मभीरु मर्दों की लार न टपकने लगे/ हमें अपनी शराफ़त पर विश्वास नहीं है? हाँ शायद इसीलिए/

यह कुछ ऐसी बात है कि कोई सुरा प्रेमी किसी दिन निकले और भट्टी वाले को पीटने लगे कि तु बनाता ही क्यूँ है जो मैं तेरे यहाँ रोज़ आ जाता हूँ/ कोई इससे इंकार नहीं करेगा कि बार गर्ल्स का काम कोई शान का काम नहीं है/ मगर ज़रा उनके ग्राहकों की लिस्ट पर भी तो नज़र घुमा ले श्रीमान/ उन लोगों को शहर से जाने को कौन कहेगा जिनके बूते ये कारोबार पनप रहा था और ये बार गर्ल्स अपनी रोज़ी कमा रही थीं?

महाराष्ट्र के आगामी चुनाव को देखते हुए शिवसेना और राज ठाकरे की नव निर्माण पार्टी में यह होड़ लगी हुई है कि कौन कितना तोड़-फ़ोड़ मार-पीट कर सकता है? उनको लगता है शायद वोटर्स इसी से प्रभावित होते हों/ क्यों इसे मराठी अस्मिता का नाम देते हो?

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इसके आगे क्या?

June 3, 2007 at 8:37 pm (विवक्षा)

यह लेख लिखते वक्त मैं न सिर्फ़ शर्मसार हूँ बल्कि उससे भी ज्यादा दुखी हूँ/ आप भी राजस्थान में हो रही घटनाओं के सन्दर्भ में निश्चित रूप से दुखी और क्षुब्ध होंगे/ यह वाकई शर्म की बात है, दुख की बात है और सबसे ज़्यादा हद दर्ज़े के राजनैतिक हरामीपन (क्षमा कीजिए मैं और विनम्र नहीं हो सकता) की मिसाल है कि शान्ति का जज़ीरा राजस्थान आग में जल रहा है/ समाज की जड़ता, मूढ़ता और जातिअन्धता के साथ ही सरकार के नाकारापन और निकम्मेपन की मिसाल है यह अराजकता/ लगता है कि सरकार और प्रशासन है ही नहीं/ राजस्थान जल रहा है अराजकता की आग में और लगता है कानून व्यवस्था बहाल करने में सरकार की दिलचस्पी है ही नहीं/ या हालात सम्हाले नही सम्हल रहे/
आरक्षण का सामाजिक सशक्तिकरण का औज़ार कैसे धारदार और हिंसक हथियार में तब्दील हो रहा है यह राजस्थान में साफ़ नज़र आ रहा है/ सब जानते हैं आरक्षण की शुरुआत समाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितसाधन के लिये हुई थी बाद में यह खेल में नेताओं को कुछ ज़्यादा ही मज़ा आने लगा/ एक किस्म की सामाजिक रिश्वत एक जाति-विशेष को दो और बस ५ साल तक लूट-खसोट का लाइसेन्स प्राप्त कर लो/
सवाल ये भी है कि क्या ये सब स्वतःस्फ़ूर्त है या कोई और पर्दे के पीछे से कठपुतलियाँ नचा रहा है. क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर खिँचता हुआ संघर्ष, ये उन्मादी तेवर कुछ और ही इंगित करते हैं/
जातिगत संघर्ष न केवल अत्यन्त हिंसक और अराजक हो गया है बल्कि विद्रोह के स्तर तक पहुँच गया मालूम होता है/ यह सिर्फ़ अपने ही मुल्क में होता है कि हम गुस्सा उतारने ले लिये अपने ही बसें जला डालते है/ अपने ही साथी नागरिकों की सम्पत्ति पर हमला कर देते हैं/ अन्य नागरिकों को तकरीबन बन्धक सा बना लेते हैं और इस सबके बाद अपने ही शहर या राज्य को आग की लपटों में झोंक देते हैं/ मॉब मानसिकता का विचार-धर्म नहीं होता/ यह भीड़ गाड़रों के रेवड़ की तरह हाँकी जाती है/ समझदार आदमी का दिमाग भी काम करना बन्द कर देता है या फ़िर उसकी बात सुनी ही नहीं जाती/
राजनैतिक मोर्चे पर देखें तो शुरू के दिनों तक किसी ने गम्भीरता भाँपी ही नहीं/ फ़िर जब होश आया कि बाज़ी हाथ से निकल रही है तब प्रयास शुरू हुए बात-चीत के और समझौते के/
दौसा से सांसद सचिन पायलट साह्ब ने दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिह से मिलने के बाद बयान जारी किया कि “सारा हिन्दुस्तान का गुर्जर समाज राजस्थान के गुर्जरों की माँग का समर्थन करता है” मगर उन्होंने इस बेशर्म ताण्डव और उपद्रव को रोकने के लिये क्या किया?

इधर वसुन्धरा जी ३-४ दिन तो जनता से नाराज़ रहीं कोई बयान नहीं कोई बात नहीं…जाओ हम तुमसे बात नही करते/ हम महारानी हैं तुम प्रजा/ हमारी मर्ज़ी थी हमने कह दिया कि आरक्षण देंगे अब नहीं है मर्ज़ी/ सोनिया गाँधी के बयानों की खिल्ली उड़ाने वाली भाजपा की यह नेत्री बयान ऐसे देती हैं जैसे किताब पढ़ रही हों/ अगर आपको याद हो तो ये ही थी जो राजस्थान मे पानी की टंकी के ध्वस्त हो जाने से लोगों की मृत्यु की घटना पर हँस पड़ी थीं.. शायद अब वे ठहाके मार रही होंगी/
पहला सवाल ये है क्यों मुख्यमन्त्री ने यह वादा किया था कि गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति में शामिल कर दिया जाएगा? सिर्फ़ टुच्चे राजनीतिक लाभॊं के लिये? इस माँग के बाद सरकारी नौकरियों में अपने हिस्से को लेकर खतरा लगा मीणा समाज को क्योंकि राजस्थाने में अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली अधिकतर सुविधाएं इसी वर्ग तक सीमित हैं/
जातीय भेद हिन्दुस्तान मे हमेशा रहे हैं मगर इस दफ़ा यह अत्यन्त हिंसक, विध्वंसक और दीर्घकालिक प्रभावों वाला है. सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ़ गुर्जर और मीणा समुदाय ही मुल्क में पिछड़े हैं? यहाँ सैकड़ों समुदाय हैं …विड्म्बना ये हो गयी है कि लोग अच्छे सुविधाओं और शिक्षा की माँग नही करते सिर्फ़ आरक्षण की माँग करते हैं/
आखिर कौन है वे लोग जो इस आक्रोश की आग को हवा दे रहे हैं ..ऐसे माहौल में जाति के स्वयम्भू नेताओं की चाँदी हो गई है/ सौदेबाज़ी के खेल में ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा पा सकें इसलिये दोनों जातियों के नेता नही चाह रहे कि ये आग बुझे/ या हो सकता है इसे बुझाना उनके बस में ही न हो/
एक कोई कर्नल साब हैं जो गुर्जरों के नेता बन के मुख्यमन्त्री से बात कर रहे हैं …याद रखिये सबसे ज़्यादा बदमाश नेता वॉलेटाइल माहौल में ही अपनी जगह बनाते हैं और खुद के लिये सबसे ज्यादा मलाई का हिस्सा सुरक्षित कर लेते हैं.
स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कैसे? क्यों गुर्जरों ने ताण्डव शुरू किया और कौन लोग थे जिन्होंने मीणा समुदाय को प्रतिक्रियात्मक हिंसा शुरू करने की सलाह दी?
सवाल ये भी है कि कौन हैं इस उन्मादित भीड़ के नेता? दोनों तरफ़ की इस भीड़ का नेतृत्व समझदारों के हाथ में तो नहीं ही है बल्कि जाति की संकुचित मानसिकता से ग्रस्त लोगों के हाथों में है जो लोग सिर्फ़ जाति के चश्मे से देख सकते हैं/ क्योंकि ये ही उनके हित में है/
यह उपद्रव हमारे सामने एक और प्रश्न रखता है/ क्या निरी गुण्डागिर्दी से माँगें मनवाई जाएंगी? आगजनी, तोड़फ़ोड़ और लूट-खसोट का माहौल/ यह सीधे सीधे गुण्डागिर्दी है. यह बिल्कुल फ़िरौती माँगने जैसा काम है
यह धार्मिक खाई से भी बड़ी एक खाई पैदा हो रही है समाज में.हिन्दुस्तान जातियों में अगर बँटा तो इसके ६४०० टुकड़े हो जाऎंगे..कोई अचरज वाली बात नहीं कल तक धर्म के नाम पर दंगे होते रहे अब उसमें एक नया डायमेन्शन जातीय दंगों का जुड़ जाएगा/ हिन्दुस्तान को जातियों में मत बाँटिये नहीं तो इसके टुकड़े खुर्दबीन से भी नज़र नहीं आएंगे/
सच में यह बहुत क्षोभ, दुःख और शर्म की बात है हम बात में नहीं लात में विश्वास करने लगे हैं/
कहाँ हैं वे महान सांसद और नेता गण जो जनता की नब्ज़ पकड़ने का दावा करते हैं क्यों नहीं समझाया जा रहा है दोनों पक्षों को…
अपनी रोटियाँ सेकने के लिये इस आग को हवा मत दीजिये ये आग घर जला कर राख कर देगी/
क्या कर लेगा कोई अगर कल कोई दूसरी जात इसी तरह के हिंसक आन्दो लन पर उतर आती है… भीड़ तर्कों से शान्त नहीं होती..उसकी मानसिकता अलग ही होती है/ यह ध्रुवीकरण अच्छे भले आदमी को जातिवादी दृष्टिकोण से सोचना सिखाया किन्होंने? इन्हीं पाखण्डी राजनीतिक नेताओं ने/
शर्म की बात ये है कि पर्यटक फ़ँसे हैं राजस्थान में जिनमें विदेशी पर्यटक भी हैं जो राजस्थान की संस्कृति को, इतिहास और कला को देखने, उसका आस्वादन करने आते हैं वे सब रास्तों में फ़ँस हुए हैं.  वैसे तो मुल्क की छवि की चिन्ता कोई करता नहीं है मगर ज़रा सोचिये फ़िर भी/ क्या छवि मुल्क की बनी? कुछ यूँ कि हिन्द्स्तान भी युगाण्डा और सोमालिया जैसा एक मुल्क है जहाँ कभी भी अराजकता फ़ैल सकती है, कभी भी कानून का राज खत्म हो सकता है और कभी भी गुण्डा तत्व प्रशासन ध्वस्त कर सकते हैं/
यह फ़साद हमारे सामने सवाल खड़े कर रहा है और चेतावनी भी दे रहा है/ आगे के लिये सचेत कर रहा है/

कल के दिन यदि ठाकुर या ब्राह्मण निकल पड़ें सड़कों पर और बिल्कुल इसी तरीके से विध्वन्स और उपद्रव पर उतारू हो जाएं तो क्या कर लेंगी हमारी सरकारें और प्रशासन/ क्या सरकारें, राज्य, प्रशासन और इस पूरे देश को  ऐसे बन्धक बनाने की अनुमति दी जा सकती है? 

डर ये नहीं कि मौत आ गई बल्कि ये है कि यमराज ने घर देख लिया/ कल अगर जाट कहते हैं कि हमको जनजाति में शामिल करो तो क्या तर्क देंगे आप और क्या वे तर्क सुनेंगे? मानेंगे? अगले विधानसभा चुनाव पास ही हैं और मौज़ूदा हालात में विपक्षी दल इस बवण्डर से अधिकतम मुनाफ़ा पाने के बारे में सोच रहे होंगे और शासक दल इस से होने वाले घाटॆ से निबटने की रणनीति बना रहा होगा/ शायद किसी दूसरे जाति को आरक्षण देने की बात कह के या ऐसा ही कुछ और चारा डालने के बारे में/
लेकिन है ही ऐसा कि जैसा बो‍ओगे वैसा काटोगे/ आखिर क्यों चुनाव के दौरान सामाजिक रिश्वतें दी जाती हैं/ भ्रष्टाचार को मिटाने का दावा करने वाली पार्टियाँ जब मुफ़्त साड़ी, मुफ़्त बिजली और बेरोजगारी भत्ते दे के फ़िर से सत्ता में लौटाने का निवेदन करती है तो क्या यह व्यवहार सामाजिक भ्रष्टाचार की परिधि में नहीं आता?

“फलाँ जाति को आरक्षण दे दिया जाएगा… नवयुवकों को बेरोज़गारी भत्ता दिया जाएगा/ महिलाओं को साड़ी बाँटी जाएगी/ चाँद देखने घर से बाहर नहीं निकलना पड़ेगा हम तुम्हारे घर के जीने पे उसे रख देंगे/” बस तुम हमें वोट दो/ बस तुम साड़ी, साइकिल , १०००-५००  रुपये बस इतने में ही खुश हो लो और हमें बेखटके लूट-खसोट का अधिकार दे दो// वोट डालो और अपने घर बैठ जाओ/ हम तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे और सत्ता की मलाई को चाटते रहेंगे खजाने को खोखला करते रहेंगे/ तुम हमें वोट नहीं दोगे तो किसी और को दोगे वो भी हमारा भाई है/
और यहीं सवाल उठता है कि क्यों कोई पार्टी ऐसे वादे करती है जो वह  पूरे नहीं कर सकती / क्यों सम्वैधानिक कामों को गैर सम्वैधानिक तरीके से करने की हामी भर दी जाती है और फ़िर जब बोतल से जिन्न बाहर आ जाता है तो सम्हालने में नानी याद आ जाती है/
इस हंगामें में कई जानें जा चुकी हैं, तमाम सूबे में अफ़रा-तफ़री मची है और आग की लपटें पड़ौसी सूबों तक फ़ैल रही हैं/ न सिर्फ़ सूबे की बल्कि मुल्क की बदनामी हो रही है..करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान हो रहा है/ मगर छॊड़ो जनाब किसको पड़ी है/
कहीं ये संघर्ष आने वाले दिनों के समाज की तस्वीर तो नहीं
“यह सपना मैं कहों विचारी! हुइहै सत्य गये दिन चारी/”

चलते चलते एक बात और शिवसैनिकों ने मुम्बई में साइबर कैफ़े में तोड़-फ़ोड़ की…वजह ये थी कि साइबर कैफ़े में नेट होता है/ नेट पर लोग वेबसाइट खोलते हैं/ दुनिया की करोडों वेबसाइट्स में से एक है ओर्कुट जो कि काफ़ी प्रचलित है फ़िलहाल/ इस ओर्कुट के कई लाख सदस्य हैं और उन कई लाख में से कुछ सद्स्यों ने शिवाजी महाराज के बारे में कुछ आपत्तिजनक लिख दिया/ सहज बात है कि शिवसैनिकों के पास इतना समय और अवकाश तो होता नहीं कि नेट पर जरा वास्तविकता परखें/

किसी ने कहा कौआ कान ले गया तो बस दौड़ पड़े कौए के पीछे/ कान देखने की ज़हमत कौन उठाए? चलो मान भी लेता हूँ कि शिवाजी महाराज के बारे मे कुछ आपत्तिजनक लिख दिया था तो भाई उस आदमी को पकड़ते एक लाठी में तो उसका सब शारीरिक भूगोल इतिहास में बदल जाता/ मगर दौड़ पड़े तमाम साइबर कैफ़ेज़ में तोड़-फ़ोड़ करने के लिये/

शिवाजी महाराज का कुछ बनने बिगड़ने वाला नहीं है और याद रखियेगा उन्होंने राज्य बनाया था/ इतिहास में बहुत कम लोग हुए हैं जिन्होंने राज्य का निर्माण किया हो/ वह भी शून्य से उठकर/ उनका नाम बदनाम न करो/

भाई सब लोग सावधान हो जाओ ओर्कुट से अपने अकाउन्ट हटा लो नहीं तो भाई लोग मारने आ जाएंगे/
य घटनाएँ अलग-अलग हैं मगर एक ही चीज़ की ओर संकेत करती हैं वो है कि मुल्क में अराजकता बढ़ रही है/

कभी भी कहीं भी कुछ भी/
जानता हूँ लिखने से क्या होगा? कुछ नहीं/ कोई शान्ति की क्रान्ति नहीं आ जाएगी/ भड़के हुए शोलों पर पानी नहीं पड़ जाएगा मगर यह भी एक तरीका है विरोध का…मैं कम से कम इसका इस्तेमाल तो करूँ/
हिन्दुस्तान क्या तोप के दहाने पर आ खड़ा हुआ है?

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May 28, 2007 at 5:40 am (विवक्षा)

प्रश्न रह जाते हैं अनुत्तरित ही
जो मैने पूछे थे तुमसे
जिनका जवाब मैं जानना चाहता था तुमसे बिना किसी लाग-लपेट के
या तुम मुझसे/
बिना मिश्री की डली में लिपटे
नीम की निबौरी की तरह जिनका हो स्वाद
उन सब सवालों पर पूछते ही पाश बाँध दिये जाते हैं
तर्क के भाषा के, और व्यंजना के
प्रश्न के ढाँचे पर होने लगती है बौद्धिक समीक्षा और बहसें/
ये पूछा सही पूछा मगर ऐसे क्यूँ वैसे क्यूँ?
प्रतिप्रश्न शुरू होते हैं मन्तव्यों पर?
किसने चढ़ाया था तुम्हें पूछने को प्रश्न?
किससे प्ररित थे सवाल?
सवाल इतना ही क्यों उतना क्यों नहीं?
सवाल में पात्र अमुक अमुक ही क्यों फ़लाँ फ़लाँ क्यों नहीं?
और असल बात कहो क्या थे हित निहित सवालकर्ता के?
ढेर ढेर वैचारिक तर्काभासों और उलझनों में सिकुड़ जाते हैं सवाल/
हम फ़िर उलझ जाते हैं बेसिरे की अन्तहीन बहसों में और
और असल चीज़ रह जाती है फ़िर से बेजवाब..
या ऐसे तो नहीं कहीं कि जवाब हो ही नहीं हमारे पास
और ये सिर्फ़ एक तरीका हो सवाल के तरीके पे उलझा के बच निकलने का/

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बाइ कास्ट क्या हैं आप?

May 26, 2007 at 4:14 am (कुछ इधर की कुछ उधर की)

कुछ दिन हुए केरल के एक प्रख्यात मन्दिर में एक केन्द्रीय मन्त्री के आगमन के उपरान्त मन्दिर को धोया गया पवित्र किया गया/ तर्क यह दिया गया कि चूँकि मन्त्री महोदय की पत्नी ईसाई हैं इसलिए वे और उनकी सन्तानें अपवित्र हैं/ मन्त्री महोदय ने बाद में कहा कि इस प्रकार से तो मेरी सन्तानें और वन्शज कभी किसी मन्दिर में जा ही नहीं पाएंगे/

ऐसी कोई पहली घटना हो ऐसा नहीं है इसके पहले भी कई बार इस प्रकार की घटनाएँ विशेषकर दक्षिण भारत के मन्दिरों में हुई हैं/ एक तरफ़ तो हिन्दू धर्म अपने को विस्तृत और उदार होने का दावा करता है और वास्तव में ऐसा बहुत हद तक है भी कम से कम उपनिषद्‌ और वेद तो ऐसा कहते ही हैं और दूसरी तरफ़ जब आचार क्रिया की बात आती है तब बिल्कुल उल्टा हो जाता है/ ब्रहम सत्यं जगन्मिथ्या का नारा बुलन्द करने वाले लोग खूब माया जोड़ने में लगे रहते हैं/

बहरहाल ऐसी घटनाओं के बाद किसी आदमी का स्वाभिमान शायद उसे विवश करेगा कि वो अपना धर्म बदल ले/ तब फ़िर हिन्दुत्व के ध्वजवाहक खूब शोर मचाएंगे/ हम धर्मान्तरण पर तो खूब बहस करते हैं और हल्ला करते हैं मगर उन दलितों और जनजातीय लोगों के लिए मन्दिरों के दरवाज़े खोलने में अब भी आनाकानी करते हैं, जो सैकड़ों सालों से हिन्दू धर्म की ध्वजा घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में फ़हराते चले आ रहे हैं/ कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अगर ईसाई मिशनरी दवाई की गोलियाँ बाँटकर लोगों को क्रिश्चियन बना लेते हैं तो उसमें क्या बुराई है/ हमने तो उन्हें इतनी भी सहूलियत मुहैया नहीं कराई/

हालाँकि मैं जानता हूँ धोखे से या बलात धर्मान्तरण निश्चित रूप से कोई श्लाघ्य कर्म नहीं है मगर क्या हिन्दू धर्म में बने रहने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन्हीं की या फ़िर धर्मध्वजियों और विद्वानों की भी है/ हमने सिर्फ़ जाति विशेष को वन्चित रखा हो ऐसा नहीं है/ आबादी की आधी हिस्से महिलाओं के साथ भी ऐसा ही हुआ है/ उज्जैन के महाकालेश्वर की भस्म आरती में महिलाओं को शामिल होने की अनुमति नहीं है/ कई सारे देवी देवता ऐसे हैं जो महिलाओं के छूने से अपवित्र हो जाते हैं फ़िर दलित और गैर हिन्दुओं की बात ही क्या/ ज़रा हिन्दू धर्म की पुनुरुत्थान वाले भाई लोग बताएंगे क्या कि आखिर कौन सा एजेन्डा हिन्दुत्व का पुनुरुत्थान कर सकता है?

हम यह तो चाहते हैं कि सब हिन्दू धर्म का सम्मान करें इसमें कोई आपत्ति है भी नहीं मगर जब भी सड़े-गले मवाद को कोई मसकता है तो बहुतों को दर्द होता है/ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने अपने प्रख्यात पुस्तक “कबीर” में लिखा है कि हिन्दुओं पर जब निरन्तर आक्रमण होते रहे तब उन्होंने अपने आप को एक सीमित दायरे में संकुचित रखने को अपना धर्म मान लिया/ इस की वजह यह रही कि उनके पास शायद उस समय और कोई विकल्प रहे ही नहीं होंगे/ मुझे छुओ मत वाली नीति अपना के रखने के सामाजिक और आर्थिक परिणाम अभी तक भुगतने पड़ रहे हैं/

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी भी अपने प्रख्यात निबन्ध “कछुआ धर्म” में यही बात कहते हैं कि हमारा धर्म कछुए के समान है जरा कुच हुआ नहीं कि खोल में सरक गए फ़िर जै राम जी की दुनिया में कुछ हुआ करे/ अपन ब्रह्म और माया के चिन्तन में व्यस्त/

मुझे प्रायः ऐसा लगता है कि हमारे धर्म में ढोंग बहुत है/ अब भई कोई मुझे लाठी ले के न दौड़ पड़ना कि तुमने हिन्दू धर्म के बारे में ऐसा कहने की हिम्मत कैसे की/ दूसरे धर्म के बारे में कह के बताते हिम्मत है तो/

तो उन लोगों का जवाब किसी दिन विस्तार से लिखूँगा अभी इतना कह दूँ कि जिस धर्म को मैने देखा समझा और जाना है उसी के बारे में तो लिख सकता हूँ/ आदमी अपने परिवार के बारे में ही लिख सकता है न कि पड़ोसियों के बारे में/ ढोंग इस मायने में कि पानी छान के पीने वाले लोग बेईमानी करने में ज़रा कोताही नहीं करते /गरीब को पटखनी देते रहने में हम ज़रा भी कमी नहीं करते/ ऐसे एकाध नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं जिन पर विस्तृत चर्चा की जा सकती है/

उपनिषद्‌ तो कहते हैं त्वं हि स्त्री त्वं हि पुमो॓ऽसि यानि कि तुम ही स्त्रि हो और तुम ही पुरुष/ आदि शंकराचार्य महाराज भी ऐसा ही कुछ कहते हैं अपने निर्वाण षटक्‌ में- “मनोऽबुद्धिऽहंकार चित्तानि नाहम्‌ चिदानन्द रूपं शिवोऽहम्‌ शिवोऽहम्‌” इसी में आगे कहा गया है कि “न मे राग द्वेषो न मे जाति भेदः” न मुझे राग है न द्वेष न जातिभेद/ मगर हम करेंगे ऐसा ही कि जब ट्रेन में कोई आदमी मिलता है तो उससे पूचे बिना रहा ही नहीं जाता कि भाई कौन ठाकुर हो या थोड़ा पढा लिखा आदमी हुआ तो पूछता है “बाइ कास्ट क्या हैं आप?” ये काल्पनिक उदाहरण सुने सुनाये नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सब घटित हुए हैं मेरे साथ/ हममें से बहुतॊ ने इस अनुभव को सहा होगा/

यहाँ कोई दलित विमर्श का नाटक अपन नहीं करने जा रहे/ सीधी बात सीधे लफ़्ज़ों में/ अभी कुछ दिन पहले मैं एक टूर पर था तो साथ के सज्जन ने आखिर कार पूछ ही लिया आप बाइ कास्ट क्या हैं? हो सकता है ये प्रश्न शायद यु.पी.एस.सी. के पेपर में आने वाला हो और उनका कोई दूसरा मन्तव्य न रहा हो/ मगर मैं ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में बड़ा अचकचाता हूँ इसलिये नहीं कि मैं किसी कथित नीची या ऊँची जाति से ताल्लुक रखता हूँ बल्कि इसलिए कि यह प्रश्न बहुत ही भौंडा मुझे लगता है/

खैर यह हमारी कथनी और करनी का अन्तर है/ इसमें ज़्यादा क्या बोलूँ/ हमारे इलाकों में आज भी चमार-भंगी एक गाली के तौर पर इस्तेमाल होती आ रही है हमारे सामाजिक परिवेश में? एक घटना याद आ रही है/ हुआ यूँ कि मेरे ओफ़िस के कम्प्यूटर ऑपरेटर से कुछ बात चलते चलते बात जाति के मुद्दों पर आगई/ उसने कहा कि हमारे पूर्वज जो नियम बना गये वे बेवकूफ़ थोड़े ही थे/ हमको उन नियमों को बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए/ यह तर्क प्रायः वे सब लोग दिया करते हैं जिनके पास खुद के विचार नहीं होते/ मेरे द्वारा इस तर्क का प्रतितर्क दिये जाने पर उसने कहा सर आप कौन सी कास्ट के हैं तब मैं आपसे और ज़्यादा इस मुद्दे पर चर्चा कर सकता हूँ? मैंने कहा फ़िर हमें इस मुद्दे पर चर्चा बन्द कर देनी चाहिए/

बहुत बार लोगों को मैने यह भी कहते सुना है कि हम तो कोई फ़रक नहीं करते मानो उन्हें फ़र्क करने का ईश्वर-प्रदत्त अधिकार प्राप्त हो और इस अधिकार का इस्तेमाल न करके वे कोई एहसान कर रहे हों/ ौनको ऐसा कहते कई बार सुना है कि हम तो दलितों के साथ बैठ के खाना खा लेते हैं/ कुछ लोग बड़े गर्व के साथ ये भी कह्ते हैं कि हमारे घर में अगर पता चल जाए कि हम चमार के साथ बैठे थे तो हमको घर वाले नहलवा दें / इन सब बयानों और बातों में जो underlying assumption है वो ये कि हम दलित के साथ खाना खा के उनपर एहसान कर रहे हैं/ उन पर उपकार कर रहे हैं/ बहरहाल हिन्दुओं ही नहीं तमाम दूसरे धर्म वालों के सामने भी कमोबेश यह जाति प्रथा की समस्या है/ मगर हमारे हिन्दू धर्म में यह कुछ ज़्यादा ही भयावह है/

सवाल ये है क्या एक जातिविहीन समाज का सपना साकार करना सम्भव है? क्या जाति हमारे सामाजिक परिवेश में एक निल फ़ैक्टर बनाई जा सकती है?

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चिन्ता की चिन्ता

May 23, 2007 at 12:01 pm (विवक्षा)

मेरा पसन्दीदा काम है तरह तरह के मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करना.. इससे और कुछ हो न हो महानता का आभास ज़रूर होता है और समाज के लिए कुछ कुछ करने की फ़ोकटिया सन्तुष्टि भी मिलती है/

अलग अलग समय अलग अलग प्रकार की चिन्ताओं के लिए नियत हैं जैसे सुबह कूड़े से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण पर और दोपहर राजनीतिक चिन्ताओं देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार आदि आदि सार्वभौमिक और सर्वकालिक चिन्ताओं के लिए नियत हैं/ एक और पसन्दीदा विषय है ग्लोबलीकरण और प्राइवेटीकरण से बढ़ता असन्तुलन (यह चिन्ता तब ज़्यादा करता हूँ जब किसी मॉल में शॉपिंग करने जाता हूँ)/ दोस्त कहते हैं नए कपड़े और पर्फ़्यूम्स लेते वक़्त ये चिन्ता आपके चेहरे पर खूब छजती है/

चिन्ता कर देने के बाद उस विषय को एक छींके पे टाँग देता हूँ ताकि वक्त ज़रूरत पे काम आए/ वैसे इस से मेरा फ़ायदा बहुत हुआ है/ कॉलेज में जब हम पढ़ते थे तो मौके-बेमौके चिन्ता प्रदर्शन की वजह से ही हमको भाषण-वाद विवाद किस्म के निहायत बोर(श्रोताओं के लिए) कामों में कालेज का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेज दिया जाता था/ मन्च पर भी इसने मेरा साथ खूब निभाया/ अगर मेरे पास विपक्षी को प्रतिरोध के तर्क नहीं होते तो मैं कह दिया करता था कि मेरी भी चिन्ता है यही है वगेरह वगेरह (चित भी मेरी पट भी मेरी) इससे क्या होता था कि दोनों तरफ़ के मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त कर दिया करता था और दोनों तरफ़ के तर्कों का इस्तेमाल कर लिया करता था/ ये दो नाव पर सवारी या कम से कम छूते हुए चलने का काम बड़ा फ़ायदेमन्द होता है/ प्रबन्धन की पढ़ाई के दौरान हमारे एक प्रोफ़ेसर साब जब भी लड़कों के जाल में फ़सते तो हमेशा कहने लगते थे “its not ‘either-or’ its ‘and-also’.”और हम उनके बौद्धिक आतंक से पीड़ित छात्र गदगद मुद्रा में आ जाते थे /
वैसे ये सिर्फ़ मेरा नहीं बल्कि ज़्यादातर महानुभावों और बौद्धिकों का काम है. बहुत बार ऐसा होता है कि चिन्ता न करो तो ऐसा लगता है कुछ खास काम अधूरा छूट गया..ईमानदारी से कहूँ तो ऐसा लगता है कि कब्ज़ की बीमारी की वजह से नित्यकर्म ठीक नहीं हुआ इस तरह का मुँह बन जाता है..

चिन्ता करने का सबसे बड़ा पहलू यह है कि जो आप सोचना चाह रहे है या जैसा सोचते हुए दिखना चाहते हैं उस तरीके की शक्लें आपको बनानी आनी चाहिए वरना यह काम गैर ज़िम्मेदाराना चिन्तन की केटेगरी में आ जाता है.. दूसरा महत्वपूर्ण फ़ैक्टर है कि आप को सिर्फ़ चिन्ता व्यक्त करनी है उन मुद्दों का समाधान कतई नहीं प्रस्तुत करना यहाँ तक कि उस दिशा में सोचने की भी मनाही है.. अगर आप समाधान करने पे उतारू हो गये तो फ़िर दूसरे दिन चिन्ता किस बात पर होगी? इसके अलावा एक चीज़ और है कि आप को विभिन्न मुद्दों पर चिन्ता व्यक्त करनी है उन मुद्दो से आपका सहमत असहमत होना एक्दम अलग चीज़ है..बिना किसी तरह की राय बनाए हुए आपको निष्पक्ष भाव से चिन्तित होते रहना चाहिए/

आप देश में बढ़ती हुई महगाई पर भी चिन्तित हो सकते है और देश की बढ़ती हुई विकास दर पर भी/ आप किसानों की आत्महत्या पर एक समय में चिन्तित हो सकते है और आपके शहर में मॉल के न होने पर उतनी ही सहजता से चिन्तित हो सकते हैं/ शहर में बढ़ रही कुत्तों की आबादी से रैबीज़ के खतरे पर शाम को चिन्ता व्यक्त की जा सकती है और सुबह उनके मारने से उत्पन्न होने वाली जैव-विविधता के संकट पर/.. कुल जमा बात ये कि चिन्तित होने के लिए कोई भी मुद्दा हो सकता है/ और याद रखिए कि ये मुद्दे ज़रूरी नहीं कि आपस में संबन्धित हों/
शाम को जब मैं सोता हूँ तो इस तरह का भाव चेहरे पर बार -बार आ जाता है कि हे मूढ़ समाज, ऐ एहसानफ़रामोश मुल्क़ ज़रा देखो तो सही मैने तेरे लिये इतनी चिन्ता की/ पूरा दिन दिन भर अपनी चिन्ताओं से दूसरों को अवगत कराता रहा/ लेकिन मुझे क्या मिला? मेरे घर में ए.सी.तक नहीं लगवाया तुम लोगों ने/ फ़िर मैं अपने कोटे की आखिरी चिन्ता करने के बाद टिटहरी जैसे टाँग उठा के सो जाता हूँ और सोते सोते सोचता हूँ कि देखो अच्छा हुआ आज इतनी चिन्ता कर ली वरना दुनिया का क्या होता?

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लोकभाषाओं के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

May 10, 2007 at 8:56 am (विवक्षा)

भाषा सम्बन्धी चिन्ता और चिन्तन आजकल एक पुरातन सोच का प्रतीक है..ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में इस प्रकार की चर्चा गैर-सामयिक और अप्रासंगिक मानी जा रही है/ नहीं जानता कि क्यूँ?

भाषा सम्बन्धी चिन्ताओं से किसी को अवगत कराओ तो वे कहते हैं क्या गैर प्रोडक्टिव सोचते रहते हो..कोई कहता है यार आज मार्केट इतना चढ़ गया तुमको भाषा की चिन्ता सता रही है/

ये चिन्ताएँ काफ़ी बार व्यक्त की गई है और कतिपय बार इसका संज्ञान भी लिया गया है/ मगर समस्या यह है कि यह खबर न तो फ़ौरी तौर पर सरसरी पैदा करती है न ही कोई जिज्ञासुकीय उत्तेजना का महौल बनाती है/ सब कुछ ठीक चलता रहता है सिवाय इस डर के कि अगर हम शतायु हुए तो शायद अपनी भाषाओं में बात करने के लिये भी तरस जाएं..

खबर ये है कि दुनियाँ की आधी से ज़्यादा भाषाएँ अगले १०० सालों में लुप्त हो जाएंगी/ हालाँकि यह ऐसा पहला समाचार नहीं है…इसके पहले भी कई बार इसके मुतल्लिक़ खबरें शाया हो चुकी हैं/ यूनाइटेड नेशन्स ने भी अपना एक वर्ष भाषाओं को समर्पित किया था/ मगर इतनी बड़ी संस्था के अपना पूरा एक साल दे देने के बावज़ूद कम्बख्त भाषाओं की दरिद्रता में कोई परिवर्तन हुआ नहीं.

बहरहाल इस लेख के मूल में चिन्ता का मुद्दा ये तो नही ही है कि हिन्दी बचेगी या नहीं (जैसा कि प्रायः लोग सोचने लगते हैं, जब भी भाषा सम्बन्धी चर्चाएँ शुरू होती हैं) मेरा पुरा विश्वास है और यह विश्वास भावुकता पर नहीं बल्कि खरे आँकड़ों पर आधारित है, कि हिन्दी न सिर्फ़ बचेगी बल्कि बढ़ेगी भी/

इस खबर में जो महत्वपूर्ण बात है वह ये कि खतरे का इंगित सिर्फ़ बहुत छोटी भाषाएँ ही नहीं बल्कि विशालतर पैमाने पर फ़ैली हुई भाषाएँ भी हैं जिनका क्षेत्र घटने की सम्भाव्यता व्यक्त की गई है/ बहरहाल मैं समझता हूँ कि फ़िक़्र का सबसे बड़ा सबब ये है कि हमारी बोलियाँ बचेंगी या नहीं यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित नहीं था उस समाचार में कि उन्होंने बोलियों को (परिभाषानुसार जिनकी खुद की लिपि न हो बल्कि वे सिर्फ़ बोली जातीं हों) भाषा माना है या नहीं, अन्यथा आँकड़े और डरावने हो सकते हैं/

भाषा की वाचिक परम्परा एक सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक क्रियोत्पाद (फ़ंक्शन) भी है/ इसको एक छोटे उदाहरण से स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ - जब तक व्यक्ति अपने खेत खलिहान से जुड़ा होता है, उच्चतर परिधियों में नहीं आता है, वह अपनी लोकभाषा या बोली बोलता है/ जैसे ही उसका अपग्रेडेशन होता है आर्थिक स्तर वह सामाजिक स्तर में भी उत्तरोत्तर प्रगति करता है और क्रमिक ढंग से अपने से श्रेष्ठतर समझे जाने वाले समुदाय की भाषा, संस्कृति, कला, रीति-रिवाज़ सब में उच्चतर समुदायों का अनुसरण करने का प्रयास शुरू कर देता है/

भाषिक परिवर्तन और बोली के भाषा में संक्रमण की शुरुआत यहीं से होती है/ वह व्यक्ति और समुदाय अपने से बेहतर वर्ग की भाषा (उदाहरण के लिए हिन्दी) बोलना (खड़ी बोली) शुरू कर देता है/ यह जो अपग्रेडेशन का स्तर है जब वह और बढ़ता है तो क्रमशः वह आदमी अंग्रेज़ी बोलना शुरू करता है/ यह एक सामान्य उदाहरण है कि आय के बढने के साथ ही व्यक्ति अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाना चाहता है और उसके मुंह से “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” की पोयम सुनना चाहता है/

किसी भाषा को श्रेष्ठता के स्तर के साथ कैसे जोड़ा जाता है या यूं कहें कि कैसे जुड़ जाती हैं इसके अपने ऐतिहासिक और सामाजिक-आर्थिक कारं होते हैं इन पर विस्तार से चर्चा कभी और/ इस विचार को ऐसे भी कहा जा सकता है कि “जैसे जैसे संस्कृतिकरण होता जाता है आदमी अपने पुराने चोले को हटा देना चाहता है और उस वर्ग की भाषा संस्कृति कला यहाँ तक कि विचारों को अपना लेना चाहता है जो उसे अपने से श्रेष्ठ वर्ग लगता है या दूसरे शब्दों में कहें तो प्रभु वर्ग/”

जैसा कि पहले ही मैने यह स्पष्ट किया कि यहाँ चिन्ता की बात यह नहीं है कि हिन्दी रहेगी या नहीं हालाँकि कोई अनन्त काल के लिए तो कोई भाषा नहीं रहती मगर चिन्ता का मुद्दा है बोलियों का बचना…क्योंकि जैसे ही आदमी शिक्षित होता है, आर्थिक समृद्धि प्राप्त करता है, वह अपनी बोली को बोलना छोड़्ने लगता है/

सांस्कृतिक प्रवाह में और समय की धारा में भाषाएँ आती जाती रहती हैं/ नई नई भाषाएं पुरानी भाषाओं का स्थान लेती रहती हैं/ यहाँ तक कि पाली और प्राकृत जैसी धार्मिक भाषाएँ भी अनन्त काल के लिए नहीं होतीं उन पर भी विलोप के खतरे मँडराए होंगे और उनका प्रचलन समाप्त हो गया होगा.. बदलते हुए सांस्कृतिक परिदृश्य में खतरे की घंटी लोकबोलियों के लिये है/ यह सांस्कृतिक परिदृश्य निश्चित रूप से आर्थिक और तकनीकी परिवर्तनों से प्रभावित होता ही है/ यदि बोलियों बोलने में, उनमें बतियाने में, सम्वाद स्थापित करने में यदि समुदायों को हीनभावना लगने लगे (अनजाने में ही सही) तो उन बोलियों का अस्तित्व कैसे टिक सकता है/ दुनियाँ की कोई भी बोली हो कोई भी मगर जन जीवन से जुड़े हुए और दैनन्दिन चर्या से जुड़े हुए शब्द जो आपको बोलियों में मिलेंगे वे उस बोली से सम्बद्ध कथित श्रेष्ठ भाषा में नहीं मिल सकते/ मैं यहाँ उ.प्र. और म.प्र. में बोली जाने वाली बोली बुन्देली का उदाहरण रखना चाहता हूँ/ खेत खलिहान और ज़मीनी अभिव्यक्ति से जुड़े हुए शब्द कुछ तो इसमें ऐसे हैं कि काफ़ी प्रयास के बावज़ूद मैं हिन्दी में उनके समानार्थी खोज नहीं सका/ मैं समझता हूँ कि ऐसा ही बाकी तमाम सारी